कोरियन खाना, कोरियन ड्रामा…आखिर कैसे तीन बहनों का काल बना कोरियन कल्चर? हुए कई चौंकाने वाले खुलासे

कोरिया जाने की जिद और बदली पहचान
पुलिस जांच और परिजनों के बयान के मुताबिक, तीनों बहनें बीते तीन-चार सालों से लगातार कोरियन ड्रामा देख रही थीं। धीरे-धीरे उन्हें कोरियन खाना पसंद आने लगा और भारतीय चीजों से नफरत होने लगी। पिता चेतन गुर्जर ने बताया कि बच्चियों ने अपने नाम तक बदल लिए थे और अपनी एक अलग ‘कोरियन पर्सनैलिटी’ बना ली थी। वे बार-बार कहती थीं कि उन्हें कोरिया जाना है और वहीं पढ़ाई करनी है।
परिजनों के अनुसार, जब भी उन्हें कोरिया जाने से मना किया जाता, तो वे नाराज हो जाती थीं। यहां तक कि अगर मोबाइल से कोरियन डीपी हटाई जाती, तो वे खाना तक नहीं खाती थीं। लड़कियों का कहना था कि अगर कोरिया नहीं मिला तो वे मर जाएंगी।
डायरी में लिखा मिला दर्द
घटना के बाद पुलिस ने मौके से एक डायरी बरामद की है, जिसमें लिखा मिला है- “मार खाने से अच्छा है हम मर जाएं।” हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में किसी भी तरह की मारपीट या चोट के निशान नहीं मिले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, तीनों की मौत अत्यधिक खून बहने की वजह से हुई है।
पहले यह आशंका जताई गई थी कि लड़कियां किसी कोरियन गेम के टास्क से जुड़ी थीं, लेकिन बाद की जांच में यह बात सामने नहीं आई। पुलिस का कहना है कि मामला मानसिक दबाव और भावनात्मक असंतुलन से जुड़ा हुआ लग रहा है।
हादसे से पहले क्या हुआ था?
पिता चेतन गुर्जर ने बताया कि 3 फरवरी की शाम परिवार में सामान्य बातचीत हुई थी। रात में उन्होंने बेटियों से सोने को कहा, लेकिन वे फिर से कोरिया जाने की बात करने लगीं। इस पर चेतन ने मोबाइल ले लिया। रात करीब 10 बजे बेटियां दोबारा मोबाइल ले गईं और बाद में रात 12 बजे उनकी मां ने मोबाइल वापस रख लिया। इसके बाद तीनों बहनें मंदिर वाले कमरे में चली गईं। इसके कुछ ही समय बाद यह दर्दनाक हादसा हो गया।
पुलिस कर रही हर पहलू की जांच
फिलहाल पुलिस मामले की गहराई से जांच कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि यह घटना बच्चों पर सोशल मीडिया, विदेशी कंटेंट और मानसिक दबाव के खतरनाक असर को दिखाती है। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि कहीं किसी बाहरी व्यक्ति या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का प्रभाव तो नहीं था।
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