महाकुंभ: गंगा तट पर खुले में शौच के मुद्दे पर NGT ने यूपी सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भेजा नोटिस

प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ के दौरान स्वच्छता व्यवस्था की खामियों को उजागर करते हुए याचिकाकर्ता निपुण भूषण ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में याचिका दायर की है। उन्होंने अपने दावे को प्रमाणित करने के लिए वीडियो साक्ष्य के रूप में एक पेनड्राइव भी अधिकरण को सौंपी है।
गंगा तट पर स्वच्छता की स्थिति पर सवाल
याचिकाकर्ता का कहना है कि कुंभ मेले में पर्याप्त जैव-शौचालयों की कमी और उपलब्ध शौचालयों की दयनीय स्थिति के कारण लाखों श्रद्धालु खुले में शौच करने को मजबूर हो रहे हैं। इससे गंगा नदी का प्रदूषण बढ़ रहा है और पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंच रही है।
एनजीटी ने भेजा नोटिस, 24 फरवरी को सुनवाई
एनजीटी की पीठ, जिसमें अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए सेंथिल वेल शामिल हैं, ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार, प्रयागराज मेला प्राधिकरण और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) को नोटिस जारी किया है। अधिकरण ने सभी संबंधित पक्षों को निर्देश दिया है कि वे सुनवाई से एक सप्ताह पहले अपना जवाब दाखिल करें। मामले की अगली सुनवाई 24 फरवरी को होगी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी प्रतिवादी को वकील के माध्यम से जवाब दाखिल करने में कठिनाई होती है, तो वह वर्चुअल माध्यम से अधिकरण के समक्ष पेश होकर अपना पक्ष रख सकता है। इसके साथ ही याचिकाकर्ता को निर्देश दिया गया है कि वह सभी प्रतिवादियों को समय से नोटिस भेजे और इसकी पुष्टि के लिए हलफनामा दाखिल करे।
वीडियो साक्ष्यों में दिखी गंगा तट पर गंदगी
याचिका में कहा गया है कि विभिन्न आगंतुकों द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो में नदी के किनारे मानव मल जमा होने के दृश्य स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। यह न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों पर भी सवाल खड़ा करता है।
10 करोड़ रुपये के पर्यावरण मुआवजे की मांग
याचिकाकर्ता निपुण भूषण ने उत्तर प्रदेश सरकार से 10 करोड़ रुपये का पर्यावरणीय हर्जाना देने की मांग की है। उनका तर्क है कि कुंभ मेले में स्वच्छता सुविधाओं की अव्यवस्था के कारण राज्य सरकार गंगा के प्रदूषण को रोकने में विफल रही है। उन्होंने "प्रदूषक भुगतान सिद्धांत" (Polluter Pays Principle) का हवाला देते हुए कहा कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले को ही उसकी भरपाई करनी चाहिए।
इसके अलावा, याचिका में संविधान के अनुच्छेद 48ए का भी उल्लेख किया गया है, जो सरकार को पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन के लिए बाध्य करता है। याचिकाकर्ता के अनुसार, खुले में शौच की अनुमति देना और प्रदूषण को रोकने में असफल रहना इस संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन है।
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