आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राज्यों को दिए ये तीन सख्त आदेश, जानें क्या कहा

पहला आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे एमिकस क्यूरी (अदालत के सलाहकार) की रिपोर्ट पर अमल करें और अपनी कार्रवाई का ब्यौरा शपथपत्र (एफिडेविट) के रूप में दाखिल करें। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि अब केवल आदेश नहीं, जमीनी स्तर पर कार्रवाई भी दिखनी चाहिए।
दूसरा आदेश
कोर्ट ने कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश अब देशभर में लागू किया जाएगा। इसके तहत, हाईवे और शहर की सड़कों से आवारा पशुओं को हटाकर उन्हें आश्रय स्थलों में रखा जाए। साथ ही, नगर निगमों को निर्देश दिया गया है कि वे 24 घंटे पेट्रोलिंग टीमें बनाएं और निगरानी के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी करें, ताकि लोग तुरंत शिकायत दर्ज करा सकें।
तीसरा आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शैक्षणिक संस्थानों, खेल परिसर, अस्पतालों, रेलवे स्टेशन और बस अड्डों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं। इन जगहों पर बाड़ या अन्य अवरोध लगाकर आवारा कुत्तों के प्रवेश पर रोक लगाई जाए। साथ ही, कुत्तों का वैक्सिनेशन और स्टरलाइजेशन कर उन्हें शेल्टर होम्स में रखने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने कहा कि सभी राज्यों को यह आदेश 8 सप्ताह के भीतर लागू करना होगा।
दिल्ली-एनसीआर से शुरू हुआ था मामला
यह मामला तब चर्चा में आया था जब 11 अगस्त को जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद में सभी आवारा कुत्तों को शेल्टर होम में रखने का आदेश दिया था। हालांकि, एनिमल लवर्स ने इस आदेश का विरोध करते हुए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष अपील की। इसके बाद, तीन जजों की बेंच ने पुराने आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि आवारा कुत्तों को पकड़कर स्टरलाइज और वैक्सिनेट करने के बाद उन्हें उनके इलाके में वापस छोड़ा जाए।
राज्यों की लापरवाही पर कोर्ट की नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया कि 22 अगस्त को सभी राज्यों से हलफनामा मांगा गया था, लेकिन अब तक केवल दो राज्यों ने ही जवाब दाखिल किया है। कोर्ट ने कहा कि यह रवैया बेहद गैर-जिम्मेदाराना है।
जजों ने सवाल उठाया
क्या राज्य के अधिकारी अखबार नहीं पढ़ते या सोशल मीडिया नहीं देखते? जब देशभर में कुत्तों के हमलों की खबरें रोज आ रही हैं, तब भी क्या उन्हें इस गंभीर मामले की जानकारी नहीं?”
अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह मामला अब केवल जानवरों की सुरक्षा का नहीं, बल्कि जनहित और सार्वजनिक सुरक्षा का भी है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो राज्य सरकारों को इसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
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