मुस्लिम शख्स की FIR पर बोला सुप्रीम कोर्ट, 'किसी को मियां-तियां या पाकिस्तानी कहने पर केस नहीं चला सकते'

सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति को 'मियां-तियां' और 'पाकिस्तानी' कहने के आरोप में राहत प्रदान की है। अदालत ने धार्मिक भावना आहत करने के आरोप में दर्ज केस को निरस्त कर दिया। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने इस प्रकार की टिप्पणी को असभ्य करार दिया, लेकिन इसे मुकदमे का आधार मानने से इनकार कर दिया।
अदालत ने टिप्पणी को असभ्य, लेकिन गैर-आपराधिक बताया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, "किसी को 'मियां-तियां' या 'पाकिस्तानी' कहकर अपमानित करना निश्चय ही असभ्यता है, लेकिन यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 298 (धार्मिक भावना को चोट पहुंचाने की नीयत से कुछ कहना) के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में नहीं आता।" यह मामला झारखंड के बोकारो जिले का है, जहां 2020 में एक मुस्लिम सरकारी कर्मचारी ने शिकायत दर्ज कराई थी।
सरकारी कर्मचारी ने दर्ज करवाई थी प्राथमिकी
यह मामला बोकारो के सेक्टर 4 थाना क्षेत्र से जुड़ा है। शिकायतकर्ता, जो चास के सब-डिविजनल ऑफिस में उर्दू अनुवादक और क्लर्क के पद पर कार्यरत था, ने एफआईआर में आरोप लगाया कि वह एडिशनल कलेक्टर के निर्देश पर एक आरटीआई आवेदन का जवाब देने गया था। उस दौरान आरोपी ने दस्तावेज लेने से पहले लंबी बहस की और धर्म आधारित टिप्पणी कर उसे अपमानित करने की कोशिश की।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा आरोपी
पुलिस ने इस मामले में आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 353 (बल प्रयोग कर सरकारी कर्मचारी को कार्य करने से रोकना), 504 (किसी को अपमानित कर शांति भंग करने का प्रयास करना) और 298 (धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने की नीयत से कुछ कहना) के तहत मामला दर्ज किया था। करीब 80 वर्षीय आरोपी को निचली अदालत से लेकर झारखंड हाईकोर्ट तक राहत नहीं मिली थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए मामले को निरस्त कर दिया कि इसमें न तो बल प्रयोग का मामला बनता है और न ही शांति भंग करने का। अदालत ने कहा कि 'मियां-तियां' कहने जैसी टिप्पणी से अपमानित करने का इरादा तो हो सकता है, लेकिन इसके आधार पर धारा 298 लगाना उचित नहीं था।
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