1. Home
  2. राजनीति विशेष

Atal Bihari Vajpayee Birth Anniversary : जब खुद के बजाय अटल जी ने विरोधी नेता के लिए किया था प्रचार, जानें यह रोचक किस्सा


Atal Bihari Vajpayee Birth Anniversary : पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee Birth Anniversary) की 100वीं जयंती पर देशभर में उन्हें याद किया जा रहा है। अटल जी केवल एक राजनेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल वक्ता, कवि और पत्रकार भी थे। उनकी वाक्पटुता और फैसले लेने की क्षमता ने उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को भी प्रभावित किया। भारतीय राजनीति में उनके योगदान को आज भी प्रेरणा के रूप में देखा जाता है। उनके जीवन से जुड़े कई प्रसंग है, जो उनकी अनूठी शख्सियत को दर्शाते हैं। ऐसा ही एक किस्सा है, जब उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान खुद के लिए नहीं, बल्कि अपने प्रतिद्वंदी नेता के लिए प्रचार किया था।


1957: जब अटल जी खुद अपनी हार की वजह बने

साल 1957 में देश में दूसरा आम चुनाव हो रहा था। इस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी उत्तर प्रदेश की मथुरा सीट से चुनावी मैदान में उतरे। लेकिन इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि उनकी हार के पीछे उनका खुद का व्यवहार था।

Atal Bihari Vajpayee Birth Anniversary : जब खुद के बजाय अटल जी ने विरोधी नेता के लिए किया था प्रचार,  जानें यह रोचक किस्सा

प्रतिद्वंदी के लिए करते थे प्रचार

मथुरा सीट से वाजपेयी जी के खिलाफ राजा महेंद्र प्रताप सिंह चुनाव लड़ रहे थे। महेंद्र प्रताप सिंह स्वतंत्रता संग्राम में अपने योगदान के लिए जाने जाते थे। अटल जी उनके योगदान का सम्मान करते हुए चुनाव प्रचार के दौरान अपनी जगह राजा महेंद्र प्रताप सिंह को वोट देने की अपील करते थे। एक सभा में उन्होंने मथुरा के लोगों से कहा, "महेंद्र प्रताप सिंह को विजयी बनाना बेहतर होगा।"


हार के बाद गंवाई जमानत

चुनाव परिणाम में राजा महेंद्र प्रताप सिंह भारी मतों से विजयी हुए, जबकि अटल जी चौथे स्थान पर रहे और अपनी जमानत भी गंवा बैठे। 1957 के चुनाव में वाजपेयी जी ने मथुरा के अलावा लखनऊ और बलरामपुर सीटों से भी अपनी किस्मत आजमाई। लखनऊ और मथुरा दोनों जगह उन्हें हार मिली, लेकिन बलरामपुर से उन्होंने जीत हासिल की और संसद पहुंचे।


कौन थे राजा महेंद्र प्रताप सिंह?

राजा महेंद्र प्रताप सिंह स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख नेता थे। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के दौरान अफगानिस्तान में निर्वासित सरकार की स्थापना की और उसके राष्ट्रपति बने। हालांकि, 1957 के बाद उनका नाम राजनीति में ज्यादा सुनाई नहीं दिया। फिर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ में उनके नाम पर विश्वविद्यालय का शिलान्यास कर उनके योगदान को सम्मानित किया।


अटल बिहारी वाजपेयी का यह किस्सा उनकी विनम्रता और उच्च राजनीतिक आदर्शों को दर्शाता है, जो आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।